और इसी आस्था के कारण श्रीनगर में उनका एक मज़ार बना दिया गया जो विदेशी यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन चुका है.
श्रीनगर के पुराने शहर की एक इमारत को रौज़ाबल के नाम से जाना जाता है.
ये शहर के उस इलाक़े में स्थित है जहाँ भारतीय भारतीय सुरक्षा बल की गश्त बराबर जारी रहती है या फिर वह अपने ठिकानों से सर निकाले चौकसी करते हुए नज़र आते हैं.
इसके बावजूद वहां सुरक्षाकर्मियों को कभी-कभी चरमपंथियों से मुठभेड़ का सामना करना पड़ता है तो कभी पत्थर फेंकते बच्चों का.
सुरक्षा स्थिति में बेहतरी से सैलानियों के लौटने की उम्मीद जवान होती है.
एक साधारण इमारत
पिछली बार जब हमने रौज़ाबल की तलाश की थी तो टैक्सी वाले को एक मस्जिद और दरगाह के कई चक्कर लगाने पड़े थे.
काफ़ी पूछने के बाद ही हमें वो जगह मिली थी.
ये रौज़ाबल एक गली के नुक्कड़ पर है और पत्थर की बनी एक साधारण इमारत है.
एक दरबान मुझे अंदर ले गया और उसने मुझे लकड़ी के बने कमरे को ख़ास तौर से देखने के लिए कहा जो कि जालीनुमा जाफ़री की तरह था.
दो हज़ार साल पहले
इस बार जब मैं फिर से यहां आया तो ये बंद था. इसके दरवाज़े पर ताला लगा था क्योंकि यहां काफ़ी पर्यटक आने लगे थे. इसका कारण क्या हो सकता था.
नए ज़माने के ईसाइयों, उदारवादी मुसलमानों और दाविंची कोड के समर्थकों के मुताबिक़ भारत में आने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति का यहां शव रखा है.
आधिकारिक तौर पर ये मज़ार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूज़ा आसफ़ का मक़बरा है.
लेकिन बड़ी संख्या में लोग ये मानते हैं कि यह नज़ारेथ के यीशु यानी ईसा मसीह का मज़ार है.
उनका मानना है कि सूली से बचकर ईसा मसीह 2000 साल पहले अपनी ज़िंदगी के बाक़ी दिन गुज़ारने कश्मीर चले आए थे.
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